अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) की पौराणिक कथा | adhikmaas ki pouranik katha |
अधिकमास की पौराणिक कथा
अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) की पौराणिक कथा हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। जब अधिकमास को सूर्य संक्रांति न होने के कारण 'मलमास' कहकर त्यागा जा रहा था, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर 'पुरुषोत्तम मास' बनाया।
यहाँ अधिकमास की मुख्य पौराणिक कथा दी गई है:
1. मलीन मास का दुख और भगवान विष्णु की शरण
पौराणिक कथा के अनुसार, भारतीय ज्योतिष और पंचांग में हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे अधिकमास या मलमास कहा जाता है।
शुरुआत में, इस महीने का कोई स्वामी (देवता) नहीं था। सूर्य संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने के कारण इसे बेहद अपवित्र और मलीन माना गया। संसार के लोग इस महीने में कोई भी शुभ कार्य, यज्ञ या मांगलिक अनुष्ठान नहीं करते थे और इसे 'मलमास' कहकर इसकी निंदा करते थे।
अपने इस तिरस्कार और निंदा से दुखी होकर मलमास साक्षात रूप धारण कर वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के पास गया। उसने रोते हुए भगवान से कहा:
"हे प्रभु! संसार में हर जीव, हर महीने और हर तिथि का कोई न कोई स्वामी है, लेकिन मेरा कोई रक्षक नहीं है। लोग मुझे अपवित्र मानते हैं और मेरा तिरस्कार करते हैं। ऐसे अपमानित जीवन से तो मेरा मर जाना ही बेहतर है।"
2. भगवान विष्णु का मलमास को गोलोक ले जाना
मलमास को अत्यंत दुखी और रोते हुए देखकर करुणामयी भगवान विष्णु को उस पर दया आ गई। भगवान विष्णु उसे सांत्वना देते हुए अपने साथ गोलोक ले गए, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण विराजमान थे।
विष्णु जी ने श्रीकृष्ण से कहा, "प्रभु! यह मलमास संसार के तिरस्कार से पीड़ित होकर मेरे पास आया है। शरणागत की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है, इसलिए मैं इसे आपके पास लाया हूँ।"
3. श्रीकृष्ण का वरदान: मलमास बना 'पुरुषोत्तम मास'
भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास की व्यथा सुनी और हंसते हुए उसकी चिंता को हमेशा के लिए दूर कर दिया। श्रीकृष्ण ने घोषणा की:
स्वयं का नाम दिया: "अब से यह महीना 'मलमास' या 'अधम मास' नहीं कहलाएगा। मैं इसे अपना सबसे प्रिय नाम 'पुरुषोत्तम' देता हूँ। आज से मैं स्वयं इस महीने का स्वामी बनता हूँ।"
सर्वश्रेष्ठ होने का वरदान: "जितने भी गुण, ऐश्वर्य और फल देने की शक्ति मुझमें है, वह सब मैं इस महीने को सौंपता हूँ। बारह महीनों में जो फल मनुष्यों को मिलता है, इस महीने में किए गए सत्कर्मों से उससे कहीं अधिक फल प्राप्त होगा।"
पुण्य का विधान: "इस महीने में जो भी मनुष्य व्रत, उपवास, दान, पूजा-पाठ और भगवद-स्मरण करेगा, उसके सारे पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे सीधे मेरे परमधाम (गोलोक) की प्राप्ति होगी।"
भगवान श्रीकृष्ण के इस वरदान के बाद से ही अधिकमास को 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाने लगा और यह सभी महीनों में सबसे पवित्र और पुण्यदायी बन गया।
अधिकमास का महत्व और नियम
चूंकि इस महीने के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) हैं, इसलिए इस दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है:
वर्जित कार्य: इस महीने में सांसारिक मांगलिक कार्य जैसे—विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, और नए व्यापार की शुरुआत नहीं की जाती।
किए जाने वाले कार्य: भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप, श्रीमद्भागवत पुराण का पाठ, दीपदान, और धार्मिक तीर्थ यात्राएं इस महीने में अत्यधिक फलदायी मानी जाती हैं।
दान का महत्व: इस महीने में मालपुए, तांबे के बर्तन, और अन्न-वस्त्र का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
निष्कर्ष: अधिकमास की कथा हमें सिखाती है कि जिसे संसार ठुकरा देता है, ईश्वर उसे गले लगा लेते हैं। यह महीना पूरी तरह से आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर की भक्ति के लिए समर्पित है।
Reviewed by Bijal Purohit
on
3:24 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: