धरो आठम का महत्व और विधि | Dharo Aatham ka mahatva aur vidhi |
धरो आठम का महत्व और विधि
![]() |
| धरो आठम का महत्व और विधि |
धरो आठम (जिसे दुर्वाष्टमी या भादवा सुद आठम भी कहा जाता है) मुख्य रूप से गुजरात और पश्चिमी भारत में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक और महत्वपूर्ण व्रत है।
|| धरो आठम का महत्व ||
संतान की लंबी उम्र और आरोग्यता
यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा बच्चों के कल्याण और दीर्घायु के लिए रखा जाता है।
दूर्वा (धरो) घास का प्रतीक
इस दिन 'धरो' यानी दूर्वा घास की पूजा की जाती है। दूर्वा घास अपनी मजबूती, सहनशीलता (गर्मी और सूखे को सहने की क्षमता) और बार-बार उगने की प्रवृत्ति के लिए जानी जाती है। माताएं यही कामना करती हैं कि उनके बच्चों का जीवन भी इसी दूर्वा की तरह संकटों से लड़ने में सक्षम और दीर्घायु हो।
पारिवारिक परंपरा
यह पर्व घर-परिवार में सुख-शांति और आपसी प्रेम को बनाए रखने का संदेश देता है।
|| धरो आठम की पूजा विधि ||
व्रत और खान-पान के नियम
इस दिन माताएं उपवास रखती हैं और दिनभर श्रद्धापूर्वक नियमों का पालन करती हैं।
कई परंपराओं में एक दिन पहले (सप्तमी के दिन) ही भोजन पका लिया जाता है और आठम के दिन बासी या एक दिन पहले का बना हुआ (टाढू) भोजन करने का विधान है। इस दिन विशेष रूप से चावल और बाजरे की 'कुलेर' (चूरमा) खाने की परंपरा है।
इस दिन ताज़ा भोजन पकाने से बचा जाता है और शाम को पूजा के बाद एक समय भोजन किया जाता है।
|| दूर्वा की पूजा ||
पूजा के समय घर या किसी पवित्र स्थान पर ताजी हरी दूर्वा (धरो घास) लाई जाती है।
विधि-विधान के साथ दूर्वा की पूजा की जाती है, रोली-अक्षत अर्पित किए जाते हैं और दीपक प्रज्वलित किया जाता है।
|| कथा श्रवण ||
पूजा के दौरान धरो आठम व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। यह कथा बच्चों के कल्याण से जुड़ी होती है।
|| दान और आशीर्वाद ||
कई जगहों पर इस दिन बेटियों या सुहागिनों को वस्त्र और दूर्वा दान में देने की भी प्रथा है। बड़े बुजुर्ग बच्चों को लंबी उम्र का आशीर्वाद देते हैं।
इस दिन किसी भी रूप में घास को काटना या नुकसान पहुँचाना वर्जित माना जाता है।
धरो आठम का महत्व और विधि | Dharo Aatham ka mahatva aur vidhi |
Reviewed by Bijal Purohit
on
12:45 pm
Rating:
Reviewed by Bijal Purohit
on
12:45 pm
Rating:

कोई टिप्पणी नहीं: