देवशयनी एकादशी और गौरी व्रत का महत्व एवं विधि | Devshyani Ekadashi/Gouvri vrat ka mahatva or vidhi |

देवशयनी एकादशी और गौरी व्रत का महत्व एवं विधि

देवशयनी एकादशी और गौरी व्रत का महत्व एवं विधि



देवशयनी एकादशी और गौरी व्रत का महत्व एवं विधि 

हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी (जिसे हरि शयन एकादशी या आषाढ़ी एकादशी भी कहते हैं) कहा जाता है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है और भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं।

इसके साथ ही, इसी एकादशी से जैन और हिंदू धर्म में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले गौरी व्रत (जिसे जयरानी व्रत या मंगला गौरी व्रत से जुड़ा रूप माना जाता है) का आरंभ भी होता है। आइए इन दोनों पर्वों का महत्व और पूजा विधि विस्तार से जानते हैं।

|| देवशयनी एकादशी (महत्व एवं विधि) महत्व ||

चातुर्मास का आरंभ

इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार माह (कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) के लिए विश्राम करते हैं। इस अवधि में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि) वर्जित माने जाते हैं।

मोक्ष प्राप्ति

इस व्रत को करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है और अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

स्वास्थ्य और संयम

चातुर्मास के दौरान खान-पान और संयम का विशेष महत्व होता है, जो शारीरिक और मानसिक शुद्धि में सहायक है।

पूजा विधि

स्नान और संकल्प

प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।

भगवान विष्णु की स्थापना

घर के मंदिर में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु (या शालिग्राम जी) की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

षोडशोपचार पूजन

भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद पीतांबर (पीले वस्त्र), पीला चंदन, जनेऊ, गंध, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।

भोग: भगवान को ऋतु फल, मिष्ठान और पंजीरी का भोग लगाएं। भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करें, क्योंकि इसके बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।

कथा और आरती

देवशयनी एकादशी की कथा सुनें या पढ़ें। अंत में धूप, दीप जलाकर श्री हरि की आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

|| गौरी व्रत (जया पार्वती व्रत / गौरी व्रत - महत्व एवं विधि) ||

महत्व

अखंड सौभाग्य और सुयोग्य वर: यह व्रत मुख्य रूप से कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं रखती हैं। कुंवारी कन्याएं मनपसंद या सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए और सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु व अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं।

माता पार्वती की कृपा

यह व्रत माता गौरी (पार्वती) को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने से माता पार्वतीार जी जैसी अटूट निष्ठा और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

अवधि

  • यह व्रत आमतौर पर देवशयनी एकादशी से शुरू होकर लगातार 5 दिनों तक या आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तक चलता है।

|| पूजा विधि ||

गौरी स्थापना

इस व्रत में माता पार्वती की मिट्टी या धातु की प्रतिमा की स्थापना की जाती है। कई जगहों पर जवार (गेहूं) बोने की परंपरा भी है, जिसे 'जवारा' कहा जाता है।

सोलह श्रृंगार

माता गौरी को सुहाग की सामग्री (चूड़ियां, बिंदी, महावर, चुनरी आदि) अर्पित की जाती है।

नियम और आहार:

इस व्रत में नमक का त्याग किया जाता है या एक समय बिना नमक का फलाहार (दूध, फल आदि) लिया जाता है। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन और सात्विक विचार रखना आवश्यक है।

रात्रि जागरण और उद्यापन

कई स्थानों पर महिलाएं रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण करती हैं। व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से पूजा के बाद उद्यापन किया जाता है और सुहागिनों या कन्याओं को भोजन व दान दिया जाता है।


  1. || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||


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