अषाढ़ी नवमी का महत्व और विधि | Ashadhi navmi ka mahatva or vidhi |
अषाढ़ी नवमी का महत्व और विधि
आषाढ़ मास की नवमी (आषाढ़ नवमी) का सनातन धर्म में विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। विशेष तौर पर आषाढ़ मास में देवी शक्ति, गुप्त नवरात्रि और भगवान शिव-विष्णु की उपासना का विधान है। आषाढ़ मास की नवमी तिथि को विशेष रूप से देवी दुर्गा (महिषासुर मर्दिनी) और शक्ति साधना से जोड़ा जाता है।
|| आषाढ़ नवमी का महत्व ||
शक्ति और तंत्र साधना
आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष के दौरान गुप्त नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है, जिसकी नवमी तिथि का विशेष तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। इस दिन माता दुर्गा के स्वरूपों की उपासना करने से अघोर सिद्धि, शत्रुओं पर विजय और विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
रोग मुक्ति और रक्षा
आषाढ़ मास से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है, जिससे मौसम में बदलाव के कारण कई प्रकार के संक्रमण और बीमारियां फैलने का डर रहता है। ऐसे में संक्रामक रोगों और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए माता की उपासना अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
कुण्डली में ग्रहों की मजबूती
इस तिथि पर देवी की पूजा करने से मंगल और चंद्रमा से जुड़े दोस्तों का शमन होता है तथा जीवन में सुख-समृद्धि व साहस की प्राप्ति होती है।
|| आषाढ़ नवमी की पूजा-विधि ||
आषाढ़ नवमी के दिन निम्नलिखित विधि से माता की आराधना करनी चाहिए:
स्नान और संकल्प
नवमी के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत और पूजन का संकल्प लें।
कलश स्थापना व चौकी
यदि आपने गुप्त नवरात्रि या विशेष अनुष्ठान किया है, तो पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। माता दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित करें।
षोडशोपचार पूजा
माता को रोली, अक्षत, लाल फूल, श्रृंगार का सामान और लाल चुनरी अर्पित करें।
विशेष अर्चन व मंत्र जाप
माता को हल्दी, कपूर और चंदन मिले जल से स्नान कराने की परंपरा है। पूजा के दौरान मां दुर्गा के बीज मंत्रों या "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" या "ॐ दुं दुर्गायै नमः" का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
कन्या पूजन और भोग
इस दिन नौ कन्याओं और एक बालक (बैटुक भैरव) का पूजन करने का विधान है। कन्याओं को आदर सहित भोजन (हलवा, पूरी और चना) कराएं और उपहार स्वरूप दक्षिणा या वस्त्र भेंट करें।
आरती और हवन
दिन के अंत में या संध्या काल में घी का दीपक जलाकर माता की आरती करें। संभव हो तो हवन या यज्ञ संपन्न कर पूर्णाहुति दें।
|| जय माताजी ||
Reviewed by Bijal Purohit
on
11:40 pm
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