वाघबारस को गौवत्स द्वादशी क्यू कहा जाता है ? vaghbaras ko gourata Dwadashi kyu kaha jata hai ?
वाघबारस को गौवत्स द्वादशी क्यू कहा जाता है ?
वाघ बारस को गोवत्स द्वादशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन मुख्य रूप से गौ-माता और उनके बछड़े की पूजा की जाती है।
इसके पीछे की पौराणिक कथा और कारण निम्नलिखित हैं |
गोवत्स पूजा का विधान
'गोवत्स' का शाब्दिक अर्थ गाय और उसका बछड़ा होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वादशी (12वीं तिथि) को यह पर्व पड़ता है, इसलिए इसे गोवत्स द्वादशी कहा जाता है।
इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की रक्षा और लंबी उम्र की कामना के लिए व्रत रखती हैं और गाय-बछड़े की पूजा करके उन्हें अंकुरित अनाज, मूंग या गेहूं खिलाती हैं।
पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीनकाल में राजा दिलीप ने महर्षि वशिष्ठ की आज्ञा से उनकी दिव्य गाय 'नंदिनी' (जो कामधेनु की पुत्री थीं) की इसी द्वादशी तिथि को सेवा और पूजा की थी।
राजा दिलीप ने अपनी संतान प्राप्ति और लोकमंगल की कामना से नित्य नंदिनी की सेवा की, जिससे प्रसन्न होकर उन्हें वरदान प्राप्त हुआ। इसी कथा और परंपरा के कारण इस दिन को गोवत्स द्वादशी के रूप में मनाया जाने लगा।
वाघ बारस नाम कैसे पड़ा?
क्षेत्रीय भाषाओं (विशेषकर गुजराती और मराठी) में "वाघ" शब्द का एक अर्थ 'बछड़ा' या बाघ (शेर) भी होता है, लेकिन यहाँ यह गोवत्स (बछड़े) के संदर्भ में ही उपयोग होता है।
समय के साथ, स्थानीय बोलियों के प्रभाव के कारण इसे 'वाघ बारस' या 'वसु बारस' कहा जाने लगा, जबकि इसका मूल धार्मिक और आध्यात्मिक नाम गोवत्स द्वादशी ही है |
- संक्षेप में, इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की प्रधानता होने के कारण ही इसे 'गोवत्स द्वादशी' कहा जाता है।|| अस्तु ||
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Reviewed by Bijal Purohit
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